हिंदी पट्टी के साथ इसबार बंगाल, पूर्वोत्तर और उड़ीसा होंगे बीजेपी के लिए निर्णायक।

Published : Apr 17, 2019 06:20 pm | By: National Mindset News

हिंदी पट्टी के साथ इसबार बंगाल, पूर्वोत्तर और उड़ीसा होंगे बीजेपी के लिए निर्णायक।

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इस लोकसभा चुनाव में एक चीज जो पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है वह है मुद्दाहीन और बिखरा हुआ विपक्ष। जहां एक ओर बीजेपी और उसके घटक दल सरकार की पांच साल की उपलब्धियों के आधार पर मैदान में है वहीं विपक्ष के पास एक भी प्रामाणिक राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है। देखा जाए तो इसबार का चुनाव राज्य के चुनावों का गठजोड़ बनता जा रहा है, जहां स्थानीय मुद्दे प्रभावी हैं। विपक्ष के पास किसी तरह का राष्ट्रीय मुद्दा है ही नहीं जो सभी 29 राज्यों और सात केंद्रशासित प्रदेशों में एक साथ प्रभावी हो।


2014 में हिन्दी पट्टी के राज्यों में मोदी समर्थक और कांग्रेस विरोधी एक लहर थी, जिस वजह से भाजपा ने इन राज्यों में लोकसभा की औसतन लगभग 90 फीसदी सीटें जीती थी जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड और गुजरात शामिल हैं। भाजपा ने अकेले इन 11 राज्यों में 216 सीटें जीती थी। भाजपा की यह जबरदस्त जीत 2019 में शायद दोहराई नहीं जा सके लेकिन पिछले पांच वर्षों में भाजपा ने इनके अलावा अन्य राज्यों में भी अपनी पकड़ मजबूत की है। मौजूदा विपक्षी गठबंधनों पर गौर करें तो इन राज्यों में भाजपा को 30 से 35 सीटों का नुकसान हो सकता है लेकिन बंगाल, उत्तर पूर्व, उड़ीसा और दक्षिण भारत में इसबार भाजपा 40 से 50 सीटें जीतती दिख रही है। उत्तर प्रदेश पर सबकी निगाह टिकी है। शुरूआत में जब सपा, बसपा और कांग्रेस गठजोड़ की बात चली थी तो लग रहा था कि पिछली बार 73 सीट जीतने वाली भाजपा इसबार 15-20 पर न सिमट जाए। लेकिन यह गठजोड़ भी बिखर गया। अब सपा-बसपा एक साथ है और कांग्रेस अलग। हर सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय हो चुका है जिसका सीधा फायदा भाजपा को ही मिलेगा। कांग्रेस अपने दो के आंकड़े को शायद ही तीन कर पाए, लेकिन भाजपा का 50 से 55 सीट तय है। कांग्रेस साफ तौर पर सपा-बसपा गठबंधन के ही वोट काटती दिख रही है। भाजपा का दावा है कि उसे 2014 की तुलना में ज्यादा बड़ा बहुमत मिलेगा, और इसके पीछे कारण भी है। एनडीए गठबंधन मजबूती के साथ एक दूसरे के साथ खड़ा है जबकि विपक्ष का राष्ट्रीय स्तर पर कोई गठबंधन है ही नहीं। भाजपा को उम्मीद है कि कांग्रेस, सपा-बसपा गठबंधन को अधिक नुकसान पहुंचा सकती है बजाए भाजपा के। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। यह इस पर भी निर्भर करता है कि इन सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार कितने प्रभावी हैं।

2014 में हिंदी भाषी राज्यों में जो मोदी लहर जमीन से ऊपर साफ तौर पर देखी जा सकती थी, वो इसबार ज्वालामुखी की तरह अंदर ही अंदर सुलग रही है। पिछली बार की लहर का सबसे बड़ा कारण था यूपीए सरकार के खिलाफ जनमानस का गुस्सा। लेकिन इसबार आम जनता एनडीए सरकार और खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपलब्धियों से संतुष्ट है। एंटी इनकंबेंसी से ज्यादा प्रो इनकंबेंसी की ही चर्चा है। हिंदी भाषी क्षेत्रों से बाहर के राज्यों में भाजपा ने पिछले पांच सालों में अपना प्रभाव जबर्दस्त ढंग से बढ़ाया है। दक्षिणी राज्यों के अपने क्षेत्रीय समीकरण हैं जिसमें काफी सोच समझकर भाजपा ने गठबंधन किया है और इसका उसे स्पष्ट फायदा मिलता दिख रहा है। फिर चाहे वह तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल हो। कर्नाटक में भाजपा का प्रभाव पहले से है और कांग्रेस-जेडीएस के अनैतिक गठबंधन ने यहां भाजपा के प्रभाव को और बढ़ाया ही है। भाजपा ने पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में कई स्थानीय गठबंधन किए हैं और हर अनुमान यह साफ बता रहा है कि पार्टी 25 में से 22 तक सीटें जीतने जा रही है। पूर्वोत्तर से कांग्रेस और लेफ्ट का लगभग सफाया हो चुका है। अंतिम रूप से लब्बो लुआब यही निकलता है कि विपक्ष के महागठबंधन की हवा पूरी तरह से निकल चुकी है और भाजपा दस हिंदी भाषी राज्यों, गुजरात और महाराष्ट्र में कुछ सीटों के नुकसान के साथ अपनी अधिकतर सीटों को बचाए रखने में कामयाब होगी और पिछली बार जिन राज्यों में भाजपा को बिल्कुल सीटें नहीं मिली थीं वहां से इस बार लगभग 50 सीटों के फायदे में रहेगी, जिससे यह साफ हो जाता है कि भाजपा और एनडीए इसबार 2014 के मुकाबले ज्यादा बड़ी जीत हासिल करने जा रही है।

 


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