राजनीति की दिशा बदलते चुनावी नारे।

Published : Mar 15, 2019 07:27 pm | By: National Mindset News

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देश में चुनाव का माहौल बन चुका है। सभी दल अपनी अपनी रणनीति तय करने में जुट चुके हैं। इनके सामने सबसे बङी चुनौती है मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करना, और इसमें सबसे बङा हथियार साबित होते हैं चुनावी नारे। चुनाव आते ही चारों तरफ नए-नए नारे छा जाते हैं। चुनावी नारे किसी भी चुनाव का अहम हिस्सा होते हैं। हमारे देश में भी आजादी के बाद से ही हर चुनाव में कुछ नारे ऐसे निकले जिन्होंने पूरी राजनीति की दिशा बदल दी।


1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान मनोबल बढ़ाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था जय जवान, जय किसान, जो आगे चलकर कांग्रेस के चुनावी समर में भी खूब हिट हुआ। 70 के दशक में सोशलिस्टों का नारा समाजवादियों ने बांधी गांठ, पिछङे पांव सौ में साठ, चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव लेकर आया। 1971 में इंदिरा गांधी के चुनावी नारे गरीबी हटाओ, ने ऐतिहासिक सफलता दिलाई और 'इंदिरा इज इंडिया' की जमीन तैयार की। इसके बाद राजीव गांधी ने भी इस नारे का प्रयोग किया। इमर्जेंसी के दौरान जयप्रकाश नारायण ने नारा दिया, इंदिरा हटाओ, देश बचाओ, जिसकी आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका रही। 1989 में कांग्रेस का विजय रथ रोकने में सफल रहे विपक्ष की अगुवाई कर रहे वीपी सिंह के लिए गढ़ा गया नारा, राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है, खूब चर्चा में रहा। कांग्रेस ने भी जवाबी नारा गढ़ा 'फकीर नहीं राजा है, सीआईए का बाजा है।' कुछ नारों ने समाज को बांटने का भी काम किया और इनकी काफी आलोचना भी हुई। बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने 80 के दशक में एक नारा दिया, तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार । लेकिन बाद में मायावती इसपर घिर गईं और वह बहुजन की जगह 'सर्वजन' की बात करने लगीं। सबको देखा बारी बारी, अबकी बारी अटल बिहारी, 1996 में लखनऊ की रैली में इस नारे का सबसे पहले उपयोग हुआ जिसने वाजपेयी जी को केंद्र की सत्ता तक पहुंचा दिया। 2004 में कांग्रेस ने, कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ, का नारा देकर सत्ता में वापसी की। 2010 के बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस का नारा मां, माटी, मानुस  ने ममता बनर्जी को काफी शोहरत दिलवायी। 2014 लोकसभा चुनाव में तो अबकी बार मोदी सरकार, और अच्छे दिन का नारा लोगों की जुबान पर ऐसा चढा कि बाकी कुछ चल ही नहीं पाया। और इसबार भी बीजेपी का नारा मोदी है तो मुमकिन है, काफी पहले से हवा में गूंजने लगा है, दूसरे दलों के नारे अभी आने बाकी हैं।


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