नवादा लोकसभा सीट : एनडीए बनाम महागठबंधन की लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया है निवेदिता सिंह ने।

Published : Apr 09, 2019 05:28 pm | By: National Mindset News

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नवादा लोकसभा का चुनाव इस बार भी दिलचस्प होने वाला है। यहां लोकसभा चुनाव में जीतने वाले चेहरे हर बार बदल जाते हैं। इस बार भी एनडीए में यह सीट लोजपा के खाते में गयी है, जबकि पिछली बार बीजेपी से गिरिराज सिंह जीते थे। वहीं, महागठबंधन से इस सीट पर आरजेडी की विभा देवी मैदान में हैं। लोजपा ने इस सीट से चंदन सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। लेकिन निर्दलीय चुनाव लड़ रही निवेदिता सिंह इन दोनों को कड़ी टक्कर दे रही हैं।


 

इसबार नवादा में दो बाहुबलियों के बीच लड़ाई है। चंदन कुमार जहां बाहुबली सूरजभान सिंह के भाई हैं, वहीं विभा देवी पूर्व विधायक राजबल्लभ यादव की पत्नी हैं। राजबल्लभ एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। लेकिन इस बार मुकाबले में इन दोनों उम्मीदवारों को निर्दलीय निवेदिता सिंह से कड़ी टक्कर मिल रही है। निवेदिता सिंह लंबे समय से राजनीति से जुड़ी हैं जबकि दोनों मुख्य उम्मीदवार राजनीति में बिल्कुल नये हैं। चंदन युवा हैं और अपने बाहुबली भाई और एनडीए की ताकत के भरोसे ही मैदान में हैं। विभा देवी घरेलू महिला हैं, जिनका राजनीति से दूर दूर तक कोई मतलब नहीं रहा है। राजवल्लभ को सजा हो जाने के कारण आरजेडी ने इन्हें मैदान में उतार दिया है। ये भी बस महागठबंधन के वोट बैंक के सहारे ही चुनाव लड़ रही हैं। वहीं दुसरी ओर निवेदिता कांग्रेस से जुड़ी रही हैं। क्षेत्र में लगातार इन्होंने काम किया है और यहां की जानी मानी नेता हैं। क्षेत्र में इनकी अपनी पहचान है। बाहुबलियों के नाम पर लड़ रहे दो अनुभवहीन उम्मीदवारों के मुकाबले इनकी साफ सुथरी छवि इनकी सबसे बड़ी ताकत है। निवेदिता सिंह 20 वर्षों से कांग्रेस से जुड़ी रही हैं। निवेदिता सिंह ने कहा कि पार्टी ने इस बार उन्हें नवादा से टिकट का आश्वासन दिया था। स्टेट कांग्रेस कमिटी ने नवादा के लिए उनके नाम की अनुशंसा भी की थी। लेकिन अंतिम वक्त में यह सीट गठबंधन दल के पाले में चली गई। उन्होंने कहा कि जनता के दबाव में वे निर्दलीय चुनाव लड़ रही हैं। बता दें कि निवेदिता सिंह 2010 में कांग्रेस के टिकट पर नवादा से विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। इसके पहले वो 2006 में जिला परिषद सदस्य रह चुकी हैं। साथ ही भूमिहार बहुल इस सीट पर बाहरी बनाम स्थानीय के मुद्दे पर भी निवेदिता का पलड़ा भारी दिखता है और नवादा लोकसभा सीट के परिणाम यहां के जातीय समीकरण से ही तय होते रहे हैं। इस लिहाज से भी भूमिहार मतदाताओं का रूझान निवेदिता की ओर दिख रहा है। इसके अलावा समाज के हर वर्ग से उन्हें समर्थन मिल रहा है। जबकि पार्टियां भी उम्मीदवार तय करने में जातीय समीकरण का पूरा ध्यान रखती हैं। पिछले 10 वर्षो से इस सीट पर भाजपा का कब्जा है। भूमिहार बहुल इस क्षेत्र से 2009 में भोला सिंह और पिछली बार गिरीराज सिंह ने शानदार जीत दर्ज की थी। हालांकि यहां मुस्लिमों और यादवों की संख्या भी पर्याप्त है, जिनके दम पर आरजेडी यहां हमेशा कड़े मुकाबले में रहती है। पिछले चुनाव में भाजपा के गिरिराज सिंह ने आरजेडी के राजबल्लभ यादव को हराया था। जेडीयू के कौशल यादव तीसरे स्थान पर रहे थे। साल 2014 के चुनाव में नवादा लोकसभा सीट में कुल मतदाताओं की संख्या 16 लाख 75 हजार 789 थी, जिसमें से मात्र 8 लाख 84 हजार 441 लोगों ने अपने मतों का प्रयोग किया था। 1971 से लेकर 2004 तक यह संसदीय क्षेत्र सुरक्षित कोटे में रहा। आजादी के बाद इस सीट से 5 बार कांग्रेस के उम्मीदवार जीते। इसके बाद 1989 और 1991 के चुनाव में यहां से सीपीएम उम्मीदवार की जीत हुई। 1996 के चुनाव में बीजेपी, फिर 1998 में आरजेडी और 1999 में बीजेपी के संजय पासवान ने जीत दर्ज की। 2004 में फिर आरजेडी को नवादा की जनता ने मौका दिया। नवादा संसदीय सीट की खास बात यह रही है कि यहां  कुंवर राम को छोड़कर कोई भी उम्मीदवार दोबारा नहीं चुना गया है। यहां दो बार जीत किसी को नहीं मिलती। कुंवर राम नवादा से 1980 और 1984 में कांग्रेस के टिकट पर जीतकर लोकसभा गए थे। इस बार त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी इस सीट पर फिलहाल तो निर्दलीय निवेदिता सिंह ही भारी पड़ती दिख रही हैं।


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