बंगाल में राजनीतिक वर्चस्व का हथियार रही है चुनावी हिंसा

Published : May 15, 2019 05:59 pm | By: National Mindset News

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लोकसभा चुनाव के दौरान खून खराबा और बड़े पैमाने पर हिंसा अब बीते जमाने की बात हो चुकी है। लोगों में बढ़ी जागरूकता, सुरक्षा के कड़े इंतजाम और चुनाव आयोग के बेहतर प्रबंधन के कारण कश्मीर और नक्सल प्रभावित इलाकों तक में शांतिपूर्ण मतदान संभव हो पाया है। लेकिन पश्चिम बंगाल इससे अछूता है। वहां की सत्ताधारी टीएमसी के गुंडे बंगाल को आज भी हिंसा और आतंक का गढ़ बनाकर रखना चाहते हैं। इसबार के लोकसभा चुनाव में पहले चरण से लेकर अबतक लगातार हिंसक घटनाएं हुई हैं, कई लोगों की जान जा चुकी है, राज्य भर में हुई अलग अलग हिंसक झड़पों में सैकड़ों लोग घायल हुए, कई प्रत्याशियों पर जानलेवा हमले हुए हैं और सबसे ताजा घटना में कोलकता में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोडशो में हुई व्यापक हिंसा ने सारी हदें पार कर दीं।


पूरे भारत में लोग उत्साह से मतदान कर रहे हैं, लेकिन बंगाल अकेला ऐसा राज्य है जहां विपक्ष को वोट देने वाले डरे हुए हैं। उन्हें इतना डरा दिया जाता है कि वे घर से भी नहीं निकलते हैं। कोलकाता में तो इतना खुलेआम ये सब नहीं हो पाता, लेकिन ग्रामीण इलाकों में यह बहुत आम और पुरानी बात है। इस बार की चुनावी हिंसा में अब तक पांच लोगों की मौत के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि बंगाल में इतनी हिंसा क्यों होती है? बंगाल में जबरदस्त बेरोजगारी की वजह से युवा सत्ताधारी दलों पर निर्भर हैं। सत्ताधारी दल के दादाओं की अनुमति के बिना न तो कोई रिक्शा चला सकता है और न ही रेहड़ी लगा सकता है। चुनाव के मौके पर सत्ताधारी दल अपनी इसी फोर्स का इस्तेमाल जीत के लिए करते हैं। तो क्या एक विकसित, उच्च साक्षरता दर और कम बेरोजगारी वाले राज्य में ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव हैं। ऐसा भी नहीं है। कई पिछड़े राज्य हैं जहां शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान हो रहा है लेकिन इन पैरामीटर पर पश्चिम बंगाल बहुत पीछे है। बंगाल में राजनीति और हिंसा का संबंध बेहद पुराना है। देश की आजादी के पहले से ही बंगाल की राजनीति पर हिंसा का साया मंडराता रहा है। वर्ष 1946 में कलकत्ता में हुई सामूहिक हत्याएं, सत्तर के दशक की शुरुआत का नक्सल आंदोलन और बाद में लेफ्टफ्रंट सरकार के दौरान मरीचझांपी जैसे सामूहिक हत्याकांड बंगाल की राजनीति के इतिहास में बड़े कलंक के तौर पर दर्ज हैं। ऐसी घटनाओं की सूची काफी लंबी है। दिलचस्प बात यह है कि इसके लिए तमाम दल अपनी कमीज को दूसरों से सफेद बताते हुए उसे कटघरे में खड़ा करते रहे हैं। इस मामले में मौजूदा मुख्यमंत्री और सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने सबको पीछे छोड़ दिया है। 1977 में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर लेफ्ट सत्तासीन हुआ। 1977 से 1990 तक राजनीतिक और चुनावी हिंसा कम रही, क्योंकि सरकार लोकप्रिय थी और विपक्ष कमजोर। लेकिन, लेफ्ट सरकार ने सत्ता जाने के डर से सत्ता समर्थक गुंडों को हिंसा की छूट दी। लेफ्ट की इसी नीति के खिलाफ ममता बनर्जी ने आंदोलन किया। 1998 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बनाई और सत्ता में भी आ गईं। ममता ने लोगों से वादा किया था कि वह साफ-सुथरी सरकार देंगी, लेकिन वह वादे पर कायम नहीं रह सकीं। चुनावी हिंसा अभी भी जारी है और कई मामलों में तो यह पहले से भी अधिक है। 1998 में ममता बनर्जी की ओर से तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद वर्चस्व की इस लड़ाई ने नए सिरे से हिंसा को जन्म दिया। उस समय ममता के मजबूत होने की वजह से जो हालात पैदा हुए थे वही हालात अब बीते पांच वर्षों में बंगाल में बीजेपी की मजबूती की वजह से बने हैं। अब कांग्रेस और सीपीएम के राजनीति के हाशिए पर पहुंचने की वजह से तृणणूल कांग्रेस व बीजेपी के बीच वर्चस्व की बढ़ती लड़ाई राजनीतिक हिंसा की आग में लगातार घी डाल रही है। वर्चस्व की जंग के लगातार तेज होने की वजह से यहां फिलहाल हिंसा पर अंकुश लगने के आसार नजर नहीं आते।
 


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