बेगूसराय में त्रिकोणीय मुकाबले में फंसे गिरिराज सिंह परेशान।

Published : Mar 27, 2019 08:25 pm | By: National Mindset News

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बिहार के बेगूसराय सीट पर बीजेपी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। पार्टी ने यहां से केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को उतारा है, लेकिन वे अपनी सीट बदले जाने से नाराज हैं और दिल्ली में बैठे हैं। दूसरी ओर सीपीआई के कन्हैया कुमार, बीजेपी के वोट बैंक में ही सेंध लगाने में जुटे हैं। इन दोनों की रस्साकशी में आरजेडी के तनवीर हसन आगे निकलते दिख रहे हैं।


बेगूसराय सीट को लेकर प्रदेश बीजेपी के अंदर घमासान मचा है। बीजेपी ने बेगूसराय से गिरिराज सिंह को टिकट दिया है लेकिन गिरिराज अपनी सीट बदले जाने से काफी नाराज हैं और प्रदेश नेतृत्व पर साजिश का आरोप लगा रहे हैं। गिरिराज के माथे पर चिंता की लकीरें हैं और बातचीत में भी उनकी चिंता साफ झलक रही है। आखिर खुद को पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता बताने वाले गिरिराज, अपनी ही प्रदेश इकाई से दो दो हाथ करने पर क्यों आमादा हैं। सूत्रों का कहना है कि गिरिराज सिंह यह मानते हैं कि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने एलजेपी के सूरजभान सिंह के साथ मिलकर, साजिश के तहत उनकी सीट बदलवायी है। और जानबूझकर उन्हें बेगूसराय के त्रिकोणीय दंगल में फंसा दिया है जबकि नवादा में इसबार मुकाबला काफी आसान था। लेकिन ये गिरिराज की पुरानी आदत है। 2014 में बेगूसराय से लड़ना चाहते थे और नवादा से टिकट मिलने पर नाराज हो गये थे। बाद में मान-मनौव्वल के बाद नवादा से लड़े और जीते। इसबार जब बेगूसराय दिया गया है तो नवादा की जिद लेकर बैठे हैं। दरअसल इस बार बेगूसराय में पेंच फंस गया है। यहां से सीपीआई ने कन्हैया कुमार को और आरजेडी ने तनवीर हसन को मैदान में उतारा है। पिछली बार यहां से चुने गये बीजेपी के भोला सिंह जैसे कद्दावर नेता के खिलाफ सीपीआई को लगभग दो लाख और आरजेडी को साढ़े तीन लाख से ज्यादा वोट मिले थे। लेकिन इसबार बीजेपी के सामने चुनौती ज्यादा बड़ी है। बेगूसराय काफी पहले से कम्युनिस्टों का गढ़ रहा है। कन्हैया युवा हैं और क्षेत्र के युवावर्ग में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। उम्मीद की जा रही है कि सीपीआई के पारंपरिक वोटर, जो पिछले वर्षों में बीजेपी से जुड़ गये थे वो फिर से वापस आ सकते हैं। इस खींचतान का सीधा फायदा महागठबंधन के उम्मीदवार तनवीर हसन को मिलेगा जिनके परंपरागत वोट मजबूती से उनके साथ हैं। गिरिराज सिंह की परेशानी की असल वजह यही है। बेगूसराय भूमिहार बहुल क्षेत्र है और लगभग 4 लाख 50 हजार भूमिहार वोटर हैं। यहां के भूमिहार पहले कम्युनिस्ट समर्थक थे जो हाल के वर्षों में बीजेपी के साथ आ गये हैं। लेकिन इसबार गिरिराज सिंह के बाहरी होने का मुद्दा और सीपीआई का मजबूत होना भूमिहार मतदाताओं को असमंजस में डाल रहा है। लोग गिरिराज सिंह को पचा नहीं पा रहे और पार्टी की स्थानीय इकाई भी उहापोह में है। ऐसे में गिरिराज सिंह को हर है कि भूमिहार मतों का यदि बड़े पैमाने पर विभाजन होता है तो उनकी नाव डूबनी तय है। हालांकि खबर आ रही है कि मान मनौव्वल के बाद वे बेगूसराय जाने पर राजी हो गये हैं। लेकिन गिरिराज सिंह के इस रवैये से बीजेपी की प्रदेश इकाई भी बहुत खुश नहीं है। गिरिराज पर हमेशा आरोप लगता रहा है कि ये खुद को पीएम का करीबी समझते हैं और प्रदेश के नेताओं को भाव नहीं देते। मिलाजुलाकर देखा जाए तो बेगूसराय का दंगल दिलचस्प हो चुका है।


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