“क्षमा, अस्पृश्यता युक्त भारत से।“

Published : Apr 06, 2019 09:06 pm | By: National Mindset News

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चुनाव की सरगर्मी चरम पर है। देश में आचार संहिता लागू है। सभी राजनीतिक दलों पर आचार संहिता का शिकंजा कसा हुआ है। ऐसे में आचार संहिता के दायरे से बाहर, राजनीतिक दलों के सहयोगी संगठन भी अपने स्तर पर कार्यक्रमों के जरिए मतदाताओं के बीच अलग अलग संदेश पहुंचाने में लगे हैं।


दलित उत्पीड़न और छुआछूत, बीजेपी का एक प्रमुख मुद्दा रहा है। लेकिन चुनाव के दौरान खुलकर किसी वर्ग विशेष की बात करना संभव नहीं है। ऐसे में ये जिम्मेदारी सम्भाली है आरएसएस से जुड़े सहयोगी संगठनों ने, जो देश भर में अलग अलग कार्यक्रमों के जरिए जागरुकता फैलाने के मुहिम में जुटी हैं। आजादी के सात दशक बाद भी देश में छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियां छायी हुई हैं जो एक सभ्य समाज के लिए शर्म की बात है। यह स्थिति तब है जब आजादी के बाद ही छुआछूत को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया था। इन कुरीतियों का दंश झेल रहे करोड़ों देशवासियों को इस जलालत से मुक्त करवाकर, पूरे सम्मान के साथ समाज में स्थापित करना ही बीजेपी, संघ और इन संस्थाओं का उद्देश्य है। इसी कड़ी में दिल्ली के अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में समाज में व्याप्त छुआछूत की समस्या पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में यह बात साफ तौर पर उभर कर आयी की दलित या छुआछूत प्राचीन भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है। इसको एक साजिश के तहत मुस्लिम शासकों और बाद में अंग्रेजों ने भारतीय समाज में फैलाया और आपसी भाइचारे और समरस समाज का प्रतीक माने जाने वाले हिन्दू समाज को जातियों में विभाजित कर दिया। दलित या छुआछूत जैसी कुरीति का वेदों या किसी भी अन्य धर्म ग्रंथ में कहीं कोई जिक्र नहीं मिलता है। प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था की परिकल्पना कर्म पर आधारित थी और शूद्रों को समाज में काफी उंचा स्थान हासिल था। यदि देखा जाए तो इतिहास के जितने भी बड़े आचार्य, विचारक और ऋषि हुए हैं, उनमें से ज्यादातर शूद्र ही थे। लेकिन रामायण की रचना करने वाले महर्षि वाल्मिकी के नाम पर आज जो जाति है वह समाज में सबसे अधिक अछूत मानी जाती है। इसी मानसिकता को बदलने की जरूरत है। इन परिचर्चाओं में उभर कर आए विद्वानों की राय को एक पुस्तक के रूप में संकलित किया गया है, जिसका नाम है, “क्षमा, अस्पृश्यता युक्त भारत से।“ इसी कार्यक्रम में इस पुस्तक का भी लोकार्पण किया गया। इसी के साथ यह संकल्प भी दुहराया गया कि भारत को जल्द से जल्द अस्पृश्यता के दंश से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा।

  


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