आरा लोकसभा क्षेत्र से चुनावी चौसर

Published : Mar 19, 2019 04:56 pm | By: National Mindset News

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आरा एक अति प्राचीन ऐतिहासिक नगर है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर सत्ता संग्राम तक आरा का बड़ा नाम रहा है। 1857 के प्रथम  स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानी बाबू कुंवर सिंह की कार्यस्थली होने का गौरव भी इस नगर को प्राप्त है। आरा, पांचवीं लोकसभा चुनाव तक शाहाबाद संसदीय क्षेत्र के नाम से जाना जाता था।


साल 1977 के दौरान आरा को अलग संसदीय क्षेत्र के रूप में मान्यता मिली और तब आरा अस्तित्व में आया। संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत विधानसभा की सात सीटें आती हैं। 1977 के आम चुनाव में यहां भारतीय लोकदल ने जीत दर्ज की तो वहीं 1980 में ये सीट जनता पार्टी सेक्यूलर के नाम रही। 1984 के चुनाव में यहां कांग्रेस के बलि राम भगत ने जीत का परचम लहराया तो वहीं 1989 में यहां इंडियन पीपुल फ्रंट के नेता रामेश्वर प्रसाद सांसद चुने गए, 1991 में ये सीट जनता दल ने जीती तो 1996 में भी उसका राज यहां पर रहा, जनता दल की जीत पर ब्रेक लगाया समता पार्टी के एच. पी सिंह ने, साल 1999 में यहां राजद की जीत हुई और राम प्रसाद सिंह यहां से सांसद बने, साल 2004 में भी यहां रालोद का साम्राज्य रहा लेकिन साल 2009 के चुनाव में ये सीट JDU ने जीत ली और मीना सिंह यहां से सांसद बनी लेकिन साल 2014 के चुनाव में इस सीट पर कमल खिला और राज कुमार सिंह सांसद बने। उन्होंने राजद के दिग्गज नेता भगवान सिंह कुशवाहा को हराया था। दूसरे नंबर पर आरजेडी, तीसरे नंबर पर सीपीआई और चौथे नंबर पर जेडीयू रही थी। साल 2014 के चुनाव में यहां पर कुल मतदाताओं की संख्या 18,32,332 थी। 8,93,213 लोगों ने अपने मतों का प्रयोग किया था जिसमें पुरुषों की संख्या 5,16,366 और महिलाओं की संख्या 3,76,847 थी। आरा की 83.26 प्रतिशत आबादी हिंदु और 15.79 % आबादी मुस्लिम है। पिछली बार की तुलना में इस बार की सियासी तस्वीर यहां बदली हुई है, जेडीयू और भाजपा साथ है, ऐसे में राजद को यहां कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है तो वहीं भाजपा इस सीट पर दोबारा जीत हासिल करने के लिए एडी़-चोटी का दम लगाएगी। वैसे जातीय समीकरणों से इतर देखें तो ये जिला आज भी विकास को तरस रहा है। आज भी यहां मूलभूत जरूरतों का अभाव है। बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से आज भी इस जिले में काफी कमी है, इसलिए विकास के नाम पर वोट मांगने वाली बीजेपी और सहयोगी दलों की जीत इस बात पर भी निर्भर करेगी कि उन्होंने यहां पर कितना विकास कार्य किया है। फिलहाल असली फैसला तो जनता को करना है।


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