वापसी के महज पांच महीने बाद ही तीन अहम राज्यों में क्यों ढीली पड़ गयी कांग्रेस की पकड़ ?

Published : May 04, 2019 02:20 pm | By: National Mindset News

वापसी के महज पांच महीने बाद ही तीन अहम राज्यों में क्यों ढीली पड़ गयी कांग्रेस की पकड़ ?

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महज पांच महीने पहले ही हिंदी पट्टी के तीन अहम राज्यों- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव हुए हैं, जहां कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी को सत्ता से बेदखल किया था। एमपी और छतीसगढ़ में तो बीजेपी पिछले 15 वर्षों से काबिज थी। हालांकि 5 महीनों में ही इन तीनों राज्यों में स्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हालत पहले से बेहतर जरूर हुई है, लेकिन इन तीनों राज्यों में इतनी जल्दी बीजेपी के मजबूत आधार को पूरी तरह तोड़ना आसान भी नहीं है।


 इसके पीछे वजहें कई हो सकती हैं। एक वजह विधानसभा और लोकसभा चुनावों का अलग-अलग मुद्दों और आधार पर लड़ा जाना है। छत्तीसगढ़ को छोड़ दिया जाए तो बाकी दोनों जगह कांग्रेस और बीजेपी में कांटे की टक्कर रही थी। ऐसे में इतनी जल्दी बीजेपी के खारिज होने का सवाल ही नहीं उठता। कांग्रेस ने इन राज्यों में पांच महीने पहले ही सत्ता सम्भाली है, ऐसे में राज्य वाले प्रदर्शन की उम्मीद रखना कुछ ज्यादती होगी। विधानसभा चुनाव में बीजेपी को लेकर जो सत्ता विरोधी लहर थी, वह लोकसभा चुनाव आते-आते काफी कम हो गयी है। कांग्रेस को मिल रही चुनौती के पीछे एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है। मध्यप्रदेश में सीबीआई ने जिस तरह मुख्यमंत्री के करीबियों के पास से करोड़ों रुपये बरामद किए, इससे बीजेपी को कांग्रेस पर हमलावर होने का बड़ा मौका मिल गया और कमलनाथ साहब बचाव की मुद्रा में ही ज्यादा दिख रहे हैं। दरअसल बीजेपी ने सत्ता के खिलाफ गुस्से से बचने की रणनीति पर विधानसभा चुनावों के दौरान ही अमल शुरू कर दिया था। राजस्थान में तो तब बाकायदा नारे लगे थे- मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुधंरा तेरी खैर नहीं। बीजेपी इस नारे के जरिए सारा आक्रोश वसुंधरा राजे की ओर मोड़ने में कामयाब रही। इसके अलावा विधानसभा के नतीजे आने के बाद पार्टी और खासतौर पर संघ ने पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर माहौल बनाना शुरू कर दिया। बताया जाता है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पार्टी कार्यकर्ताओं को दिसंबर से ही चुनावी तैयारी में जुटने के संकेत दिए थे। वैसे भी हिंदी पट्टी के इन तीनों राज्यों में बीजेपी का आधार मजबूत है। उस पर मोदी फैक्टर असर दिखा रहा है। बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद बना माहौल, राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे चुनाव में फैक्टर बन रहे हैं। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी 6 महीने से कम समय में बीजेपी के मजबूत संगठन को हिलाना। फिर कांग्रेस के कई बड़े नेता जो कुछ समय पहले तक सीएम की रेस में थे, वह किसी न किसी वजह से अपने राज्यों में ज्यादा रुचि और समय नहीं दे पा रहे हैं। यह बात खासतौर पर राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट और मध्य प्रदेश के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के बारे में कही जा रही है। सिंधिया अपने लोकसभा चुनाव और यूपी के प्रभार के चलते एमपी से दूर हैं। सीएम कमलनाथ को भी छिंदवाड़ा पर अधिक ध्यान देना पड़ रहा है, जहां से वे काफी लंबे समय तक खुद सांसद रहे और अब उनके बेटे नकुल नाथ खड़े हैं। इसी तरह राजस्थान में सीएम अशोक गहलोत ने चुनाव की कमान अपने हाथ में रखी है। उनके बेटे वैभव गहलोत भी जोधपुर से किस्मत आजमा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में सीएम भूपेश बघेल के बाद दूसरे बड़े नेता टी.एस. सिंहदेव को ओडिशा का प्रभार दिया गया है, क्योंकि वहां के प्रभारी भंवर जीतेंद्र सिंह चुनाव लड़ने अपने गृहराज्य राजस्थान लौट गये हैं। तो मिला जुलाकर मामला थोड़ा गड़बड़ा सा गया है। कांग्रेस इन राज्यों में वर्षों बाद हाथ में आयी सत्ता को अभी ढंग से जमा भी नहीं पायी थी की लोकसभा चुनाव सिर पर आ खड़ा हुआ। उपर से बड़े नेताओं की खींचतान, बीजेपी के आक्रामक तेवर और जनता से किये गये वादों का दबाव। अब ऐसे में जितनी इज्जत बच जाए उतनी ही बहुत है।   


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