लालू के बिना सूनी है बिहार की चुनावी फिजा।

Published : Apr 12, 2019 07:33 pm | By: National Mindset News

लालू के बिना सूनी है बिहार की चुनावी फिजा।

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लालू यादव को लेकर एक कहावत खूब मशहूर हुई थी। 'जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू।' लेकिन इसबार लालू नहीं हैं बिहार में। अब बिहार में न लालू की सरकार है और न ही लालू इसबार के लोकसभा चुनाव में प्रचार करते नजर आएंगे। पिछले 40 साल में पहली बार बिहार की राजनीति लालू के बिना बिल्कुल अलग और सूनी सूनी नजर आ रही है। इस बार वोटर न सिर्फ लालू के दिलचस्प भाषणों से वंचित होंगे बल्कि उनका ठेठ अंदाज भी नहीं दिखेगा।


सुप्रीम कोर्ट से जमानत याचिका खारिज होने के साथ ही यह तय हो गया कि इस लोकसभा चुनाव में लालू यादव की उपस्थिति नहीं रहेगी। 40 साल में यह पहला मौका होगा जब उनकी गैर मौजूदगी में चुनावी बिसात बिछेगी और जाहिर है कि बिहार का चुनावी रंग फीका ही रहने वाला है। चुनाव में अब उनके गंवई शब्दों के भेदी बाण भी ताबड़तोड़ नहीं चलेंगे। बिहार की राजनीति में लालू की मौजूदगी काफी  मायने रखती है। संसदीय चुनाव से बेदखल होने और फिर उनके जेल जाने से खास जमात के उत्साह में मानो शून्यता आ गयी है। कई दशक तक खुद लालू केंद्र या राज्य की राजनीति की बदौलत अपने समर्थकों के दिलों पर राज करते रहे। किसी न किसी रूप में उनकी सक्रियता को लोगों ने महसूस किया। बिहार की सियासत के 40 साल में पहली बार है कि लालू प्रसाद यादव चुनावी रणभूमि में नजर नहीं आ रहे हैं। लालू की अनुपस्थित में आरजेडी की बागडोर उनके बेटे और बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव संभाल रहे हैं। परिवार के अंदर ही घमासान मचा है। 1977 के बाद यह पहली बार है जब लालू यादव चुनाव से दूर हैं। 1977 में पहली बार 29 साल की उम्र में लालू छपरा लोकसभा से चुनाव जीते थे। इसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। और 1990 के बाद तो लालू बिहार में हुए हर चुनाव की धुरी बन गये। उनके चुनाव प्रचार का खास अंदाज लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा। आज लालू यादव भले ही जेल में हों, लेकिन मिथक के तौर पर अभी भी बिहार की सियासत में मौजूद हैं। जेल में रहते हुए लालू ने जिस तरह से दलों को जोड़कर गठबंधन और सीटों का बंटवारा किया, इससे साफ है कि लालू अपनी अनुपस्थिति में भी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब रहे हैं। लालू 2015 विधानसभा चुनाव के समय जमानत पर बाहर थे और अपनी खोयी जमीन को समेटने में जुटे थे। ऐसा लग रहा था कि लालू का जादू खत्म हो चुका है लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और पासा पलट दिया। बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी और राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की आंधी के बाद लालू यादव ही ऐसे एकलौते नेता थे, जिन्होंने मोदी और अमित शाह के विजय रथ पर ब्रेक लगाने में कामयाबी हासिल की। लालू यादव ने नीतीश कुमार के साथ दुश्मनी भुलाकर हाथ मिलाया और नया राजनीतिक समीकरण बनाया। इसका नतीजा था कि 2015 के विधानसभा चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी को बिहार में करारी मात खानी पड़ी। लेकिन इसबार फिर समीकरण बदल चुके हैं। नतीश बीजेपी के साथ हैं और लालू चुनावी सीन से बाहर। ऐसे में महागठबंधन 2015 के नतीजे दोहरा पाएगा, कहना मुश्किल है।


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