अक्षय तृतीया के शुभ मुहूर्त में खुले गंगोत्री, यमुनोत्री के कपाट, चार धाम यात्रा शुरू

Published : May 08, 2019 08:05 pm | By: National Mindset News

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गंगोत्री यमुनोत्री के कपाट खुलने के साथ उत्तराखंड की पवित्र चार धाम यात्रा की शुरुआत हो गयी है। हिन्दू धर्म में चार धाम यात्रा का बड़ा महत्व है। कुछ साल पहले तक यह यात्रा काफी कठिन मानी जाती थी, लेकिन अब यहां काफी विकास हो चुका है। आरामदायक सड़कों और ठहरने की उत्तम व्यवस्था के कारण यह यात्रा अब काफी सुगम हो गयी है। इस साल चार धाम के दर्शनों के लिए प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां पूरी हो चुकी हैं।  


चार धाम यात्रा हर साल अक्षय तृतीया के दिन गंगोत्री से शुरू होती है। उत्तरकाशी जिले में ग्रेटर हिमालय रेंज में स्थित गंगोत्री धाम को गंगा का उद्गम माना गया है। गंगोत्री के कपाट मंगलवार 7 मई को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। गंगा का उद्गम स्रोत यहां से लगभग 19 किमी दूर गोमुख स्थित गंगोत्री ग्लेशियर में है। मान्यता है कि शिव की कृपा से देवी गंगा ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया था। यहीं 18वीं सदी में गढ़वाल के गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया था। यहां शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न है। गंगोत्री के बाद यात्रा का दूसरा पड़ाव है यमुनोत्री। उत्तरकाशी जिले की यमुना घाटी में स्थित है यमुनोत्री। इस साल यमुनोत्री के कपाट भी मंगलवार को खोले गये। यमुना नदी का उद्गम यहीं से माना गया है। यमुना का वास्तविक स्रोत कालिंदी पर्वत पर स्थित जमी हुई बर्फ की एक झील और हिमनद चंपासर ग्लेशियर है। वर्तमान मंदिर का निर्माण जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में करवाया था। 1919 में टिहरी के महाराजा प्रताप शाह ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। मंदिर के गर्भगृह में देवी यमुना की काले संगमरमर की मूर्ति स्थापित है। चारधाम यात्रा का तीसरा पड़ाव केदारनाथ को माना जाता है। मान्यता है कि तीर्थयात्री यमुना और गंगा के जल को यमुनोत्री और गंगोत्री से लाकर केदारनाथ का जलाभिषेक कर बाबा केदारनाथ को प्रसन्न करते हैं। रुद्रप्रयाग जिले में मंदाकिनी और सरस्वती नदियों के संगम पर स्थित केदारनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इस साल केदारनाथ के कपाट श्रद्धालुओं के लिए गुरुवार 9 मई को खुल जाएंगे। भूरे रंग के विशालकाय पत्थरों से निर्मित कत्यूरी शैली के इस मंदिर का निर्माण पांडव वंश के राजा जनमेजय ने कराया था। मंदिर के गर्भगृह में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। मान्यता है कि आठवीं सदी में चारों दिशाओं में चार धाम स्थापित करने के बाद 32 वर्ष की आयु में आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ धाम में ही समाधि ली थी। चारधाम यात्रा में चौथा पड़ाव बदरीनाथ को माना जाता है। यमुनोत्री, गंगोत्री और केदारनाथ के दर्शन करने के बाद यहां के दर्शन की परंपरा है। उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित भू-वैकुंठ बदरीनाथ धाम भगवान विष्णु को समर्पित है। इस साल बदरीनाथ धाम के कपाट 10 मई की सुबह खुलेंगे। विष्णु पुराण, महाभारत व स्कंद पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसे देश के पौराणिक चार धामों में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। यहां शालिग्राम पत्थर से बनी एक मीटर ऊंची श्रीविष्णु की मूर्ति है। मान्यता है कि इसे आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी के आसपास नारद कुंड से मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया था।


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