लोकसभा चुनाव 2019: हाशिये पर वाम मोर्चा

Published : May 11, 2019 02:07 pm | By: National Mindset News

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एक ओर जहां इस चुनाव में बड़े राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने की जंग में उलझे हैं, वहीं वाम मोर्चे के लिए अपना अस्तित्व बचाए रखना भी मुश्किल दिख रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव में वामदलों का प्रदर्शन लोकसभा में बसे ज्यादा खराब रहा था। इस बार उनके सामने प्रदर्शन में सुधार लाने की चुनौती है। वामपंथी दल विपक्षी एकता के भी अगुआ रहे हैं। लेकिन यदि उनकी सीटें इस बार भी नहीं बढ़ीं तो संसद के बाहर और भीतर अपनी पहचान कायम रख पा भी उनके लिए मुश्किल हो जाएगा। 


भारतीय राजनीति में मुख्यत: चार वामपंथी दल सक्रिय हैं, जिन्हें वाम मोर्चे के रूप में जाना जाता है। इनमें माकपा, भाकपा, आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लाक शामिल हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव में इन चार दलों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 59 सीटें हासिल की थीं, जिनमें माकपा ने 43, भाकपा ने 10 और बाकी दो दलों ने तीन-तीन सीटें जीती थीं। मगर, 2014 में इनका प्रदर्शन सबसे खराब रहा और 11 सीटों पर सिमटकर रह गए। इसबार भी अबतक हए 5 चरण के चुनाव में वामदलों की स्थिति अच्छी नहीं है। पिछले चुनाव में त्रिपुरा में वामदलों ने दो सीटें जीती थी, लेकिन अब वहां भाजपा की सरकार है और वामदलों की हालत ठीक नहीं है। दूसरे, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं हो सका। पिछले चुनाव में उसने राज्य में दो सीटें जीती थीं, लेकिन इसबार टीएमसी-बीजेपी की टक्कर में एक सीट भी मुश्किल दिख रही है। वामदलों का एक बड़ा गढ़ केरल है। केरल में उनकी सरकार भी है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान वहां कांग्रेस की सरकार थी। इसलिए वामदलों के लिए जो भी उम्मीद बची है, वह केरल में दिखती है। पिछले चुनाव में वे पांच सीटें जीतने में सफल रहे थे। लेकिन केरल में भी इस बार न सिर्फ कांग्रेस ने अपनी स्थिति सुधारी है बल्कि बीजेपी भी अपना खाता खोलने की तैयारी में है। ऐसे में वाम मोर्चा अपनी 5 सीट भी बचा ले तो गनीमत है। केरल को छोड़ देश के सभी हिस्सों से उनका प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है। इसबार वाम मोर्चा कुल 170 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है लेकिन परिस्थितियां 5 सीट से ज्यादा की बनती दिख नहीं रही हैं। संसद के भीतर और बाहर वामदल आर्थिक नीतियों और श्रमिकों के मुद्दे उठाते रहे हैं। संसद में उनकी संख्या निर्णायक भले न रह गयी हो लेकिन उनकी आवाज दबाव समूह का काम करती है। ऐसे में एक मजबूत लोकतंत्र में उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।


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